सेवा में,
बुद्धिजीवी वर्ग एवं नागरिक समाज बिहार
माननीय मुख्यमंत्री , बिहार सरकार
माननीय उप मुख्यमंत्री , बिहार सरकार
माननीय नेता प्रतिपक्ष , बिहार विधानसभा
माननीय नेता सदन , बिहार विधानसभा , सभी राजनीतिक दल
विषय:- बिहार में शिक्षा एवं शिक्षण के गौरवशाली परंपरा के पुनर्स्थापना के संबंध में।
महाशय,
बिहार का गौरवशाली इतिहास बहुआयामी रहा है। बिहार आदि काल से हीं धर्म , शिक्षा , शासन व्यवस्था , लोकतंत्र की जननी और जनतांत्रिक भावनाओं की उर्वरा भूमि रहा है।
एक तरफ जहां इस भूखंड को जगत जननी का जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है तो वहीं दूसरी तरफ विश्व के तीन प्रमुख धर्म बौद्ध ,जैन और सिख के प्रवर्तकों का जन्म , ज्ञान एवं कर्म भूमि होने का भी गौरव हासिल है। महान गुरु चाणक्य के कुशल मार्गदर्शन में महान चन्द्रगुप्त मौर्य ने पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरो कर शासन का उत्कृष्ट नमूना पेश किया तो शेरशाह सूरी ने ग्रैंड ट्रैंक रोड , भूमि मापन , कृषि और जनसुविधाओं की श्रृंखला से शासन के लोकोभिमूखी होने का परंपरा पेश किया। वैशाली के लिच्छवी गणराज्य को विश्व का प्रथम गणतंत्र होने का गौरव प्राप्त है तो विद्यापति , राष्ट्र कवि दिनकर , बाबा नागार्जुन, भिखारी ठाकुर , रेणु और बेनीपुरी जनभावनाओं के प्रकटीकरण को अलग आयाम देते हैं।
चंपारण सत्याग्रह , स्वतंत्रता आंदोलन , भूदान आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन आदि यह बताने के लिए काफी है कि यह भूमि सामाजिक-राजनीतिक क्रांतियों की प्रयोगशाला रहा है और इस गुण के बीज इस धरती में सदैव विद्यमान हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास , आर्यभट्ट ,बोधायन , पाणिनी ,मंडन मिश्र, वाल्मीकि , विश्वामित्र का जिक्र किए बिना बिहार के शिक्षण परंपरा का इतिहास पूर्ण नहीं हो सकता।
पहले बख्तियार खिलजी और उसके बाद लॉर्ड मैकाले के हमले भी मेधा के इस उर्वर भूमि को बंजर बनाने में असफल साबित हुए। बिहार में आजादी के संघर्षों के दौरान और उसके बाद सामाजिक प्रणेताओं द्वारा स्थापित और राज्य द्वारा संरक्षित प्रारंभिक, उच्च विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय से शिक्षित लोगों ने भारत हीं नहीं वरन् पूरे विश्व पटल पर बिहारी मेधा का परचम लहराया। ज्ञान का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां बिहार के शैक्षिक राजदूतों ने अपना दखल स्थापित नहीं किया। वो भी क्या दिन थे जब गांव के सभी कोटि, वर्ग के बच्चे एक विद्यालय में एक जैसी शिक्षा पाते थे ।क्या डाक्टर, इंजिनियर , पदाधिकारी या व्यापारी , मजदूर सबके बच्चे एक साथ पढ़ते , खेलते और व्यक्तिगत ग्रहण क्षमता के अनुसार सफलता हासिल करते थे।आज भी विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका में लगभग 80% लोग इन्हीं सरकारी शिक्षण संस्थानों से निकल कर इस मुकाम तक आए हैं।
राज्य के बंटवारे में प्राकृतिक संसाधनों से भरा क्षेत्र झारखंड में चले जाने के बाद जब बिहार में कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचा था , तब समय था कि बिहार अपने बौद्धिक संपदा का उपयोग करता। बिहार की अर्थव्यवस्था को शिक्षा आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील करता। बिहार के जो छात्र मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य प्रकार की उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाकर, पैसा खर्च कर अन्य राज्यों की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं ,ना सिर्फ वो पैसा बिहार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता बल्कि बाहर से भी पैसा आता । रोजगार के अवसर सृजित होते। सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित उद्योग का विकास होता , जिससे ना सिर्फ इस क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं को बाहर नहीं जाना पड़ता बल्कि विदेशी पूंजी भंडार भी बिहार में आता।ऐसी स्थिति में बिहार सचमुच विकसित राज्यों के श्रेणी में खड़ा होता।
परन्तु आज ? बिहार के सरकारी विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े भवन और इमारत तो बन गए हैं पर ये सब बिहारी शिक्षण के गौरवशाली परंपरा के भग्नावशेष भर रह गए हैं। शिक्षक तो हैं परन्तु शिक्षण नहीं है। इन विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से लोगों को डिग्री तो मिल रही है परन्तु ज्ञान और गुणवत्ता गायब है। यह सच है कि आज भी बिहारी युवा सफलता हासिल कर रहे हैं परन्तु सफलता का प्रतिशत गिर रहा है और मुख्य बात यह है कि इसमें सरकारी शिक्षण संस्थानों की भूमिका सीमित होने के कारण इस सफलता का विस्तार समाज के सभी तबकों में नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज का बड़ा हिस्सा गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से वंचित होता जा रहा है जो उन्हें भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा का अधिकार , समानता के अधिकार और सम्मान पूर्वक जीवन के अधिकार से वंचित करने जैसा है।
आप तमाम नीति नियंताओं, बुद्धिजीवी वर्ग और जनसाधारण से करबद्ध निवेदन है कि राज्य में चल रहे शिक्षा नीति और व्यवस्था में परिवर्तन समय की मांग है, इसकी अनदेखी न की जाए। किसी भी समाज/ राष्ट्र का विकास तब तक अधूरा हीं माना जाएगा , जब-तक वहां गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का व्यापक प्रसार नहीं होगा।
शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य का मतलब सिर्फ नामांकन दर , साक्षरता दर बढ़ाना, प्रजनन दर घटाना और डिग्रियां प्रदान करना और अयोग्य शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी करना नहीं है।
वरन् शिक्षा से तात्पर्य है कि व्यक्ति में विषय वस्तु की व्यापक समझ विकसित हो, व्यक्तित्व का विकास हो। किसी भी परिस्थिति में संयम रखने के गुण का विकास हो। विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास हो।उचित-अनुचित की समझ का विकास हो , तदनुसार निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो।
बेहतर शिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर छिपे विशिष्ट प्रतिभा की पहचान और विकास करना है। व्यक्ति की अभिरुचि के अनुसार पेशा के लिए पात्रता प्रदान कर , अवसर प्रदान करना है।
प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान शिक्षा नीति , व्यवस्था और पद्धति उपरोक्त वर्णित लक्ष्यों को हासिल करने में सक्षम है ?
सरकारी विद्यालयों की तो बात छोड़िए गांव-गांव, कस्बों और शहरों में चल रहे असंख्य निजी विद्यालयों द्वारा दिए जा रहे शिक्षण उपरोक्त वर्णित लक्ष्यों को हासिल करने में सक्षम हैं ? पूरी इमानदारी से विश्लेषण करने पर निश्चित हीं इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक हीं आएगा। इस देश में वर्ष 2009 में भारतीय संसद ने "मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार" को संविधान का हिस्सा बनाया। यह अधिनियम " मुफ्त एवं अनिवार्य" के साथ हीं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की गारंटी करती है। आप में से कितने लोगों ने यह विचार करने का जहमत उठाया है कि शहरों, कस्बों और गांवों तक अमरबेल की तरह पसर रहे ये निजी विद्यालय शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित मापदंड पूरे करते हैं या नहीं ? निश्चित हीं इस प्रश्न का उत्तर भी नकारात्मक हीं होगा। ये विद्यालय ना तो आधारभूत संरचना के मापदंड पर खड़े उतरते हैं और ना हीं शिक्षा की गुणवत्ता के मापदंड पर । फिर किन परिस्थितियों में ऐसे विद्यालयों को अब तक संचालित होने दिया जा रहा है या नए-नए विद्यालय खुल रहे हैं और किन शर्तों पर उन्हें सरकार से प्रस्वीकृति मिल रही है। जब इन विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता निर्धारित मापदंड के अनुरूप नहीं है तो इन्हें संचालित होने देकर निम्न मध्यम वर्ग और जनसाधारण को मानसिक और आर्थिक शोषण के लिए इनके हवाले क्यों छोड़ दिया गया है ? वर्तमान में सरकारी विद्यालयों की स्थिति पर कटाक्ष करने वाले बंधुओं को उपरोक्त कसौटियों पर निजी विद्यालयों को भी कस कर देख लेना चाहिए कि शिक्षा के इन दुकानों पर गुणवत्ता पूर्ण माल उपलब्ध है भी या नहीं ? शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक सुविधाओं के गिरे स्तर का क्या नुकसान हुआ है यह हम कोरोना आपदा में बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं और यह भी महसूस कर रहे होंगे कि आपदा की स्थिति में सरकारी अस्पताल और सकूल हीं काम आ रहे हैं।
ऐसी स्थिति में अगर मध्यम वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग और जनसाधारण को इस गुणवत्ताहीन शैक्षणिक , आर्थिक शोषण से मुक्ति पाना है तो एकमात्र समाधान राज्य/देश के अंदर वंचितों, शोषितों, निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए सार्वजनिक शिक्षा के एकमात्र केन्द्र सरकारी विद्यालयों और शैक्षणिक तंत्र को सुधारने की पहल करनी होगी। समान स्कूल प्रणाली को अमलीजामा पहनाना होगा । संसाधनों का समानुपातिक वितरण सुनिश्चित करना होगा। पाठ्यक्रम में विगत दो दशक में किए गए परिवर्तन की समीक्षा कर वस्तुनिष्ठ पद्धति को न्यूनतम करके उसमें विस्तृत अध्ययन की पद्धति पर वापस जाना होगा। सतत मूल्यांकन के साथ ही परीक्षा की पुरानी पद्धति को वापस लाने की जरूरत है। शिक्षकों को चुनाव, आपदा और जनगणना के अतिरिक्त तमाम तरीकों के गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति देनी होगी। शिक्षकों को शोषणमुक्त वातावरण देना होगा और वो स्वस्थ मानसिक स्थिति में कार्य कर सकें, इसके लिए उन्हें भेदभाव रहित उचित पारिश्रमिक सेवा शर्त और सुविधाएं भी देना होगा।
बिहार में जारी वर्तमान शिक्षक हड़ताल इन्हीं तथ्यों पर केन्द्रित है।यह। बहुत संकुचित सोच है कि शिक्षक सिर्फ वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल कर रहे हैं। बिहार सहित पूरे देश के सार्वजनिक शिक्षा के प्रति जागरूक बुद्धिजीवी , समाज और राजनीतिक वर्ग को इस पर गंभीरता से विचार करने और निर्णय लेने की आवश्यकता है। अशिक्षित या अर्द्ध शिक्षित समाज के साथ हम कभी विकसित राज्य या राष्ट्र होने का स्वप्न नहीं पूरा कर सकते हैं।
अतः आप तमाम राजनीतिक , बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज से यह विनम्र निवेदन है कि बिहार में जारी शिक्षक हड़ताल को इसी नजरिए से देखें और इसका समर्थन कर , समाधान की दिशा में पहला कदम बढ़ाएं।
इन पूरी परिस्थितियों को #दुष्यंत के शब्दों में व्यक्त करना और आपका आह्वान करना चाहता हूं -
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.....
हर सड़क पर हर गली में ,हर नगर हर गांव में
हांथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई......
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.......
मेरे सीने में नहींही तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.........
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
#FavourTeachersStrikeBihar
#स्वास्थ्य_शिक्षा_हो_पूर्ण_सरकारी
#जंग_जीत_तक_रहेगी_जारी
आपका
Amit Kumar
प्रदेश सचिव
TET STET उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ गोपगुट बिहार

