Thursday, April 30, 2020

सार्वजनिक शिक्षा के बुनियादी जरूरत और शिक्षक हड़ताल



सेवा में,
बुद्धिजीवी वर्ग एवं नागरिक समाज बिहार
माननीय मुख्यमंत्री , बिहार सरकार
माननीय उप मुख्यमंत्री , बिहार सरकार
माननीय नेता प्रतिपक्ष , बिहार विधानसभा
माननीय नेता सदन , बिहार विधानसभा , सभी राजनीतिक दल


विषय:- बिहार में शिक्षा एवं शिक्षण के गौरवशाली परंपरा के पुनर्स्थापना के संबंध में।

महाशय,

बिहार का गौरवशाली इतिहास बहुआयामी रहा है। बिहार  आदि काल से हीं धर्म , शिक्षा , शासन व्यवस्था , लोकतंत्र की जननी और जनतांत्रिक भावनाओं की उर्वरा भूमि रहा है।
एक तरफ जहां इस भूखंड को जगत जननी का जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है तो वहीं दूसरी तरफ विश्व के तीन प्रमुख धर्म बौद्ध ,जैन और सिख के प्रवर्तकों  का जन्म , ज्ञान एवं कर्म भूमि होने का भी गौरव हासिल है। महान गुरु चाणक्य के कुशल मार्गदर्शन में महान चन्द्रगुप्त मौर्य ने पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरो कर शासन का उत्कृष्ट नमूना पेश किया तो शेरशाह सूरी ने ग्रैंड ट्रैंक रोड , भूमि मापन , कृषि और जनसुविधाओं की श्रृंखला से शासन के लोकोभिमूखी होने का परंपरा पेश किया। वैशाली के लिच्छवी गणराज्य को विश्व का प्रथम गणतंत्र होने का गौरव प्राप्त है तो विद्यापति , राष्ट्र कवि दिनकर , बाबा नागार्जुन, भिखारी ठाकुर , रेणु और बेनीपुरी जनभावनाओं के प्रकटीकरण को अलग आयाम देते हैं।
चंपारण सत्याग्रह , स्वतंत्रता आंदोलन , भूदान आंदोलन से लेकर सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन आदि यह बताने के लिए काफी है कि यह भूमि सामाजिक-राजनीतिक क्रांतियों की प्रयोगशाला रहा है और इस गुण के बीज इस धरती में सदैव विद्यमान हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास , आर्यभट्ट ,बोधायन , पाणिनी ,मंडन मिश्र, वाल्मीकि , विश्वामित्र का जिक्र किए बिना बिहार के शिक्षण परंपरा का इतिहास पूर्ण नहीं हो सकता।
पहले बख्तियार खिलजी और उसके बाद लॉर्ड मैकाले के हमले भी मेधा के इस उर्वर भूमि को बंजर बनाने में असफल साबित हुए। बिहार में आजादी के संघर्षों के दौरान और उसके बाद सामाजिक प्रणेताओं द्वारा स्थापित और राज्य द्वारा संरक्षित प्रारंभिक, उच्च विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय से शिक्षित लोगों ने भारत हीं नहीं वरन् पूरे विश्व पटल पर बिहारी मेधा का परचम लहराया। ज्ञान का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं था जहां बिहार के शैक्षिक राजदूतों ने अपना दखल स्थापित नहीं किया। वो भी क्या दिन थे जब गांव के सभी कोटि, वर्ग के बच्चे एक विद्यालय में एक जैसी शिक्षा पाते थे ।क्या डाक्टर, इंजिनियर , पदाधिकारी या व्यापारी , मजदूर सबके बच्चे एक साथ पढ़ते , खेलते और व्यक्तिगत ग्रहण क्षमता के अनुसार सफलता हासिल करते थे।आज भी विधायिका , कार्यपालिका और न्यायपालिका में लगभग 80% लोग इन्हीं सरकारी शिक्षण संस्थानों से निकल कर इस मुकाम तक आए हैं।

राज्य के बंटवारे में प्राकृतिक संसाधनों से भरा क्षेत्र झारखंड में चले जाने के बाद जब बिहार में कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बचा था , तब समय था कि बिहार अपने बौद्धिक संपदा का उपयोग करता। बिहार की अर्थव्यवस्था को शिक्षा आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील करता। बिहार के जो छात्र मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य प्रकार की उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाकर, पैसा खर्च कर  अन्य राज्यों की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं ,ना सिर्फ वो पैसा बिहार की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता बल्कि बाहर से भी पैसा आता । रोजगार के अवसर सृजित होते। सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित उद्योग का विकास होता , जिससे ना सिर्फ इस क्षेत्र में काम करने वाले युवाओं को बाहर नहीं जाना पड़ता बल्कि विदेशी पूंजी भंडार भी बिहार में आता।ऐसी स्थिति में बिहार सचमुच विकसित राज्यों के श्रेणी में खड़ा होता।

परन्तु आज ? बिहार के सरकारी विद्यालय , महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में बड़े-बड़े भवन और इमारत तो बन गए हैं पर ये सब बिहारी शिक्षण के गौरवशाली परंपरा के भग्नावशेष भर रह गए हैं। शिक्षक तो हैं परन्तु शिक्षण नहीं है। इन विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से लोगों को डिग्री तो मिल रही है परन्तु ज्ञान और गुणवत्ता गायब है। यह सच है कि आज भी बिहारी युवा सफलता हासिल कर रहे हैं परन्तु सफलता का प्रतिशत गिर रहा है और मुख्य बात यह है कि इसमें सरकारी शिक्षण संस्थानों की भूमिका सीमित होने के कारण इस सफलता का विस्तार समाज के सभी तबकों में नहीं है। इस प्रकार हम देखते हैं कि समाज का बड़ा हिस्सा गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा से वंचित होता जा रहा है जो उन्हें भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा का अधिकार , समानता के अधिकार और सम्मान पूर्वक जीवन के अधिकार से वंचित करने जैसा है।
आप तमाम नीति नियंताओं, बुद्धिजीवी वर्ग और जनसाधारण से करबद्ध निवेदन है कि राज्य में चल रहे शिक्षा नीति और व्यवस्था में परिवर्तन समय की मांग है, इसकी अनदेखी न की जाए।  किसी भी समाज/ राष्ट्र का विकास तब तक अधूरा हीं माना जाएगा , जब-तक वहां गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का व्यापक प्रसार नहीं होगा।
शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य का मतलब सिर्फ नामांकन दर , साक्षरता दर बढ़ाना, प्रजनन दर घटाना और डिग्रियां प्रदान करना और अयोग्य शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी करना नहीं है।
वरन् शिक्षा से तात्पर्य है कि व्यक्ति में विषय वस्तु की व्यापक समझ विकसित हो, व्यक्तित्व का विकास हो। किसी भी परिस्थिति में संयम रखने के गुण का विकास हो। विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास हो।उचित-अनुचित की समझ का विकास हो , तदनुसार निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो।
बेहतर शिक्षण व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति के भीतर छिपे विशिष्ट प्रतिभा की पहचान और विकास करना है। व्यक्ति की अभिरुचि के अनुसार पेशा के लिए पात्रता प्रदान कर , अवसर प्रदान करना है।
प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान शिक्षा नीति , व्यवस्था और पद्धति उपरोक्त वर्णित लक्ष्यों को हासिल करने में सक्षम है ?
सरकारी विद्यालयों की तो बात छोड़िए गांव-गांव, कस्बों और शहरों में चल रहे असंख्य निजी विद्यालयों द्वारा दिए जा रहे शिक्षण उपरोक्त वर्णित लक्ष्यों को हासिल करने में सक्षम हैं ? पूरी इमानदारी से विश्लेषण करने पर निश्चित हीं इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक हीं आएगा। इस देश में वर्ष 2009 में भारतीय संसद ने "मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार" को संविधान का हिस्सा बनाया। यह अधिनियम " मुफ्त एवं अनिवार्य" के साथ हीं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की गारंटी करती है। आप में से कितने लोगों ने यह विचार करने का जहमत उठाया है कि शहरों, कस्बों और गांवों तक अमरबेल की तरह पसर रहे ये निजी विद्यालय शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित मापदंड पूरे करते हैं या नहीं ? निश्चित हीं इस प्रश्न का उत्तर भी नकारात्मक हीं होगा। ये विद्यालय ना तो आधारभूत संरचना के मापदंड पर खड़े उतरते हैं और ना हीं शिक्षा की गुणवत्ता के मापदंड पर । फिर किन परिस्थितियों में ऐसे विद्यालयों को अब तक संचालित होने दिया जा रहा है या नए-नए विद्यालय खुल रहे हैं और किन शर्तों पर उन्हें सरकार से प्रस्वीकृति मिल रही है। जब इन विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता निर्धारित मापदंड के अनुरूप नहीं है तो इन्हें संचालित होने देकर निम्न मध्यम वर्ग और जनसाधारण को मानसिक और आर्थिक शोषण के लिए इनके हवाले क्यों छोड़ दिया गया है ? वर्तमान में सरकारी विद्यालयों की स्थिति पर कटाक्ष करने वाले बंधुओं को उपरोक्त कसौटियों पर निजी विद्यालयों को भी कस कर देख लेना चाहिए कि शिक्षा के इन दुकानों पर गुणवत्ता पूर्ण माल उपलब्ध है भी या नहीं ? शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक सुविधाओं के गिरे स्तर का क्या नुकसान हुआ है यह हम कोरोना आपदा में बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं और यह भी महसूस कर रहे होंगे कि आपदा की स्थिति में सरकारी अस्पताल और सकूल हीं काम आ रहे हैं।
ऐसी स्थिति में अगर मध्यम वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग और जनसाधारण को   इस गुणवत्ताहीन शैक्षणिक , आर्थिक शोषण से मुक्ति पाना है तो एकमात्र समाधान राज्य/देश के अंदर वंचितों, शोषितों, निम्न वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए सार्वजनिक शिक्षा के एकमात्र केन्द्र सरकारी विद्यालयों और शैक्षणिक तंत्र को सुधारने की पहल करनी होगी। समान स्कूल प्रणाली को अमलीजामा पहनाना होगा । संसाधनों का समानुपातिक वितरण सुनिश्चित करना होगा। पाठ्यक्रम में विगत दो दशक में किए गए परिवर्तन की समीक्षा कर वस्तुनिष्ठ पद्धति को न्यूनतम करके उसमें विस्तृत अध्ययन की पद्धति पर वापस जाना होगा। सतत मूल्यांकन के साथ ही परीक्षा की पुरानी पद्धति को वापस लाने की जरूरत है। शिक्षकों को चुनाव, आपदा और जनगणना के अतिरिक्त तमाम तरीकों के गैर शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति देनी होगी। शिक्षकों को शोषणमुक्त वातावरण देना होगा और वो स्वस्थ मानसिक स्थिति में कार्य कर सकें, इसके लिए उन्हें भेदभाव रहित उचित पारिश्रमिक सेवा शर्त और सुविधाएं भी देना होगा।
बिहार में जारी वर्तमान शिक्षक हड़ताल इन्हीं तथ्यों पर केन्द्रित है।यह। बहुत संकुचित सोच है कि शिक्षक सिर्फ वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल कर रहे हैं। बिहार सहित पूरे देश के सार्वजनिक शिक्षा के प्रति जागरूक बुद्धिजीवी , समाज और राजनीतिक वर्ग को इस पर गंभीरता से विचार करने और निर्णय लेने की आवश्यकता है। अशिक्षित या अर्द्ध शिक्षित समाज के साथ हम कभी विकसित राज्य या राष्ट्र होने का स्वप्न नहीं पूरा कर सकते हैं।
अतः आप तमाम राजनीतिक , बुद्धिजीवी वर्ग और नागरिक समाज से यह विनम्र निवेदन है कि बिहार में जारी शिक्षक हड़ताल को इसी नजरिए से देखें और इसका समर्थन कर , समाधान की दिशा में पहला कदम बढ़ाएं।
इन पूरी परिस्थितियों को #दुष्यंत के शब्दों में व्यक्त करना और आपका आह्वान करना चाहता हूं -

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.....
हर सड़क पर हर गली में ,हर नगर हर गांव में
हांथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई......
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.......
मेरे सीने में  नहींही तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन, आग जलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई.........
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
#FavourTeachersStrikeBihar
#स्वास्थ्य_शिक्षा_हो_पूर्ण_सरकारी
#जंग_जीत_तक_रहेगी_जारी

आपका
Amit Kumar
प्रदेश सचिव
TET STET उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ गोपगुट बिहार

Saturday, August 14, 2010

आजादी के ६३ वर्ष

भारतीय स्वतंत्रता के ६३ वर्ष पुरे होने सभी भारतवासियों एवं भारतवंशियों को हार्दिक बधाईयाँ । आशा है आप सभी यह नहीं भूले होंगे की कितनी कठिनाईयों के पश्चात् ये आजादी हमें प्राप्त हुई थी । हमारी पीढ़ी को ये जो जन्मजात उपहार प्राप्त हुआ है , इसका सम्मान करना एवं इसे बनाये रखना हमारा पुनीत कर्तव्य है ।

Saturday, July 3, 2010

सर्वप्रथम नालंदा - विरासत से खंडहर तक

खंडहरों से ही महल की भव्यता का बोध होता है , अगर ये पंक्ति नालंदा के सन्दर्भ में कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । नालंदा विश्व इतिहास में दफ़न वो केंद्र है जो वर्तमान परीपेक्ष्ये में विशिस्ट है । अपने वैभवशाली इतिहास की वजह से आज भी आकर्षण का केंद्र है । चौथी शताब्दी से लेकर बारहवी शताब्दी तक विश्व में अज्ञानता के बादल छाए हुए थे , उस काल में नालंदा अपने वैभव के परकाष्ठा पर था । शिक्षारुपी क्षितिज पर चमकता हुआ ध्रुवतारा , अपने विशिष्ट शिक्षा प्रणाली के वजह से यह वैश्विक शिक्षण का मुख्य केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ । ह्वेनसांग यात्रा वृतांत में नालंदा को विश्वस्त्रीये संस्थान के रूप में उल्लेखित करते हुए लिखते है कि " इस शिक्षण संस्थान में दस हज़ार छात्र तथा पंद्रह सौ शिक्षक अध्ययन एवं अध्यापन से जुड़े थे "। इस विश्वविद्याले में छात्र सिर्फ भारतवंशी ही नहीं थे वरण चीन , जापान , इरान , सिंगापुर। कम्बोडिया आदि देश से भी छात्र आते थे । नागसेन जैसे बौद्ध विद्वान इस शिक्षण से जुड़े हुए थे ।

नालंदा को अगर हम समान्य अर्थ में देखने के कोशिश करे तो स्पष्ट रूप से यह ज्ञात होगा कि " इतिहास का वह भाग जो न होकर भी जो हमे कुछ दे रहा है । यह अपने आप में अदभूत तथा अविश्व्सनिये है । एतिहासिक विडम्बना का अपवाद नालंदा भी नहीं रहा है , और इसके भी पुरातत्व के खोज का श्रेय ब्रिटिश पुरात्त्वेता 'अलेक्जेंडर कनिघम ' को जाता है । उनके प्रयास से ही आधुनिक विश्व को नालंदा के गौरवशाली इतिहास देखने और समझने का अवसर मिला।
कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में शिक्षा के महत्व को वर्णित करते हुए लिखते है कि " किसी भी राज्य का राजकुमार अगर अनपढ़ है तो वो राज्य उसी प्रकार समाप्त हो जाये गा जिस तरह घुन लगी हुई लकरी । भारतीय दर्शन में भी शिक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए इसके अनिवार्यता पर बल दिया गया है । फलतः नालंदा के स्थापना के मूल में कहीं न कही इस महान वैचारिक परम्परा का अनुशरण किया गया है । नालंदा के स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त(४५५ई - ४६७ई) को जाता है । गुप्तकालीन शासक के उपरांत हर्षवर्धन एवं पाल शासक ने भी नालंदा को विश्वस्तारिये बनाने का हरसंभव प्रयास किया । ह्वेनसांग नालंदा हर्ष के काल में ही आया था और वो अठारह साल तक नालंदा में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया था । नालंदा अपने विकाश के चरण में समकालीन शासक पर निर्भर था , परन्तु उसकी स्वायता अक्षुण रखी गयी । इस तथ्य को हम इस रूप में देख सकते है कि गुप्तकाल या इसके उपरांत के शासक वर्ग मुख्य रूप से हिन्दू धर्म के अनुयायी थे इसके वावजूद नालंदा का विकाश बौद्ध धर्म के अध्ययन केंद्र के रूप में हुआ । इसके पीछे कहीं न कही नालंदा को विश्वस्तरिये अध्ययन केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास था । अध्ययन केंद्र के रूप में विकाश के पीछे तत्कालीन सामजिक परिस्थिति भी थी , समाज में बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था ।

नालंदा मुख्य रूप से बौद्ध के महायान शाखा से सम्बंधित था । पाली भाषा की शिक्षा अनिवार्य थी । विश्वविद्यालय का परिसर १४ हेक्टेयर में फैला हुआ था । जिसमें ८ परिसर तथा १० मंदिर स्थित थे । समान्यत: सभी मंदिर बौद्ध धर्म के थे । यहाँ बौद्ध स्तूप होने का भी उल्लेख मिलता है । नालंदा विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण अंग इसका पुस्तकालय भी था । पुस्तकालय किसी भी संस्थान के आत्मा के रूप में जाना जाता है । पुस्तकालय के महत्व को हम उसकी नौ मंजली इमारत से अंदाज़ लगा सकते है । विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित मंदिरो में मंदिर संख्या तीन सबसे बड़ी थी ।

इतिहास की सबसे बड़ी विडम्बना है कि " किसी न किसी रूप में यह विनाश या अंत के पर्याय समझा जाता रहा है "। नालंदा का गौरवशाली इतिहास भी इस अछूता नहीं रहा पाया । विदेशी छात्रो के साथ - साथ यह विदेशी आक्रमणकारियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा था । नालंदा पर आक्रमण करने वाला प्रथम आक्रमणकारी हूण थे । मिहिराकुल ने सबसे पहले अपनी बुरी नज़र नालंदा पे डाला । इसके बाद के काल में नालंदा कई छोटे - बड़े आक्रमण का केंद्र रहा है , लेकिन सभी हमला बस लुट - पाट के लिए गए । जिसके वज़ह से इसके महत्व पर आंच नहीं आये । १२वी शताब्दी तक आते - आते समाज पूरी तरह से बदल चूका था । भारतीय शासक के हाथ से सत्ता जा चुकी थी और अरबो
का शासन स्थापित हो चूका था । अरबो का उद्देश्य भारत पर शासन करना ही नहीं था वरण वो इस्लाम को तलवार के बल पर स्थापित भी करना चाहते थे । इस के प्राप्ति के लिए अरबो ने सबसे पहले धार्मिक संस्थान और शिक्षण संस्थान की तरफ नज़र डाला । इसी करी में उन्होंने नालंदा पे आक्रमण किया । सन ११९३ई में ऐबक के एक सेनापति बख्तियार खिलजी ने इस महान शिक्षण संस्थान को अग्नी के चरणों में समर्पित कर दिया । विनाश का आकलन हम उस इतिहासिक तथ्य के आधार पर कर सकते है कि विश्वविद्यालय परिसर में लगी आग को समाप्त होने में छ; महीने से अधिक समय लग गए । इस सन्दर्भ
में इतिहासकारों का मंतव्य है कि " नालंदा के प्रभाव ने ही उसे प्रभावहीन कर दिया " ।

आज के पश्च्मिमोनुमुखी समाज में नालंदा के प्रति वैचारिक शून्यता आना स्वाभविक है । आर्थिक युग में हर चमकती चीज़ सोना होता है वही संस्कृति या परम्परा कचरे के ढेर से प्रतीत होते है । यही वजह है की नालंदा अपने अस्तित्व के साथ संघर्ष करता नज़र आता है । भारतीय शिक्षण संस्थान पूरी तरह से विदेशी संस्थान के नक़ल करने पर उतारू है जबकी नालंदा के गौरवशाली इतिहास को महत्व नहीं देते है । नालंदा के गौरव को वापस लाने में जनता तथा सरकार का नजरिया एक सा लगता है । आज़ादी के उपरांत सरकार नालंदा को एक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करने का प्रयास करने की कोशिश तो करती रही है परन्तु इसके गौरवशाली अतीत की उपेक्षा करती रही है । इस विषय पर चौतरफा मौन देखने को मिलता है । साहित्यकार तथा बुद्धिजीवी के बीच भी यह एक व्यंगात्मक उपमा से अधिक महत्व नहीं रखता है ।

नालंदा के गौरवशाली इतिहास को वापस लेन के प्रयास में तब एक
मह्त्वपूर्ण कदम उठाये गए जब तत्कलीन रक्षामंत्री जाँर्ज फर्नांडीस ने जापान के सरकारी यात्रा पर (१२ जनवरी २०००) नालंदा को पुनर्स्थापित करने की बात कही । इसके उपरांत संसद से नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में विद्येयक बन जाने के बाद संभावना नज़र आता है । अंतररास्ट्रीय स्टार पर भी इसके पुनरउद्हार में सहयोग देने की बात कही गयी है । विश्व के कई देशों ने नालंदा को विश्वस्तारिये संस्थान बनाने के संबंद में प्रतिबधता दिखाते हुए सहयोगे की बात की है । लेकिन समस्त प्रयासों के बिच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है कि " नालंदा अपने उस गौरवशाली परम्परा का निर्वाह कर पायेगा या अन्य भारतीय शिक्षण संस्थान की तरह इसका भी वही हश्र होगा " । यह यक्ष प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि " नालंदा वह अतीत है जो वर्तमान से अधिक आकर्षक और सुखद है "।
साभार -पंकज कुमार

Saturday, June 19, 2010

बिहार- अतीत , वर्तमान एवं भविष्य

बिहार - भारत के उत्तर -पूर्व सीमा पर अवस्थित एक राज्य । इस राज्य का एक गौरवशाली इतिहांस है । जगत जननी जानकी से लेकर भगवान गौतम बुध , महावीर , चाणक्य , चन्द्रगुप्त मौर्य , सम्राट अशोक , आर्यभट , महर्सी वाल्मीकि एवं दानवीर कर्ण की कर्मभूमि । शेरशाह शूरी ,1857 के वीर योद्धा वीर कुंवर सिंह ,अविभाजित बिहार के भगवान बिरसा मुंडा ,मिथिलांचल गौरव विद्यापति ,भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही डॉ राजेंद्र प्रसाद ,जय प्रकाश नारायण ,मोइनुल हक , बिहार केसरी डॉ श्री कृष्ण सिंह , श्री अनुग्रह नारायण सिंह , श्री ललित नारायण मिश्र , बाबु जगजीवन राम ,शहीद जुब्बा सहनी सूचि बहुत लम्बी है । उपर जिन नामों की चर्चा मैंने की है , उनके बारे में विस्तार से लिखने बैठूं तो एक - एक व्यक्ति के उपर पूरा का पूरा ग्रन्थ लिखा जा सकता है और लिखा गया भी है । मैं उन सभी महान विभूतियों की आत्मा से क्षमा चाहता हूँ जिनका नाम मैं यहाँ नहीं लिख पाया हूँ ।वैसे यह सूचि सिखों के दसवें गुरु की चर्चा किये बिना अधूरी रह जाएगी ,अकाल तख्त के संस्थापक गुरु गोविन्द सिंह की जन्मस्थली भी बिहार ही है।
साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर , नागार्जुन , रामब्रिक्ष बेनीपुरी ,गोपाल सिंह नेपाली,फनीश्वरनाथ रेणु इत्यादी ने बिहार का नाम रौशन किया है । वहीँ शरत चन्द्र ,जय शंकर प्रसाद,जानकी वल्लभ शास्त्री इत्यादी कितने ही साहित्यकारों की रचनाओं की पृष्टभूमि बिहार रहा है ।
बिहार के अतीत की चर्चा वैशाली के बिना अधूरी है । विश्व को गणतंत्र की अवधारणा देने वाले वैशाली को हम कैसे भूल सकते हैं । आपको पता है , वैशाली में उस समय लोकतान्त्रिक व्यवस्था थी जब विश्व ने उसके बारे में कल्पना भी नहीं की होगी ।
शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय के योगदान को भुलाना अपराध के समान है । उस समय पुरे विश्व के विद्यार्थी ज्ञानार्जन हेतु नालंदा आते थे । नालंदा का खंडहर इस बात का गवाह है की बिहार में उस समय भवन निर्माण कला कितनी सुव्यवस्थित थी ।