Saturday, July 3, 2010

सर्वप्रथम नालंदा - विरासत से खंडहर तक

खंडहरों से ही महल की भव्यता का बोध होता है , अगर ये पंक्ति नालंदा के सन्दर्भ में कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । नालंदा विश्व इतिहास में दफ़न वो केंद्र है जो वर्तमान परीपेक्ष्ये में विशिस्ट है । अपने वैभवशाली इतिहास की वजह से आज भी आकर्षण का केंद्र है । चौथी शताब्दी से लेकर बारहवी शताब्दी तक विश्व में अज्ञानता के बादल छाए हुए थे , उस काल में नालंदा अपने वैभव के परकाष्ठा पर था । शिक्षारुपी क्षितिज पर चमकता हुआ ध्रुवतारा , अपने विशिष्ट शिक्षा प्रणाली के वजह से यह वैश्विक शिक्षण का मुख्य केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ । ह्वेनसांग यात्रा वृतांत में नालंदा को विश्वस्त्रीये संस्थान के रूप में उल्लेखित करते हुए लिखते है कि " इस शिक्षण संस्थान में दस हज़ार छात्र तथा पंद्रह सौ शिक्षक अध्ययन एवं अध्यापन से जुड़े थे "। इस विश्वविद्याले में छात्र सिर्फ भारतवंशी ही नहीं थे वरण चीन , जापान , इरान , सिंगापुर। कम्बोडिया आदि देश से भी छात्र आते थे । नागसेन जैसे बौद्ध विद्वान इस शिक्षण से जुड़े हुए थे ।

नालंदा को अगर हम समान्य अर्थ में देखने के कोशिश करे तो स्पष्ट रूप से यह ज्ञात होगा कि " इतिहास का वह भाग जो न होकर भी जो हमे कुछ दे रहा है । यह अपने आप में अदभूत तथा अविश्व्सनिये है । एतिहासिक विडम्बना का अपवाद नालंदा भी नहीं रहा है , और इसके भी पुरातत्व के खोज का श्रेय ब्रिटिश पुरात्त्वेता 'अलेक्जेंडर कनिघम ' को जाता है । उनके प्रयास से ही आधुनिक विश्व को नालंदा के गौरवशाली इतिहास देखने और समझने का अवसर मिला।
कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में शिक्षा के महत्व को वर्णित करते हुए लिखते है कि " किसी भी राज्य का राजकुमार अगर अनपढ़ है तो वो राज्य उसी प्रकार समाप्त हो जाये गा जिस तरह घुन लगी हुई लकरी । भारतीय दर्शन में भी शिक्षा के महत्व को स्वीकार करते हुए इसके अनिवार्यता पर बल दिया गया है । फलतः नालंदा के स्थापना के मूल में कहीं न कही इस महान वैचारिक परम्परा का अनुशरण किया गया है । नालंदा के स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त(४५५ई - ४६७ई) को जाता है । गुप्तकालीन शासक के उपरांत हर्षवर्धन एवं पाल शासक ने भी नालंदा को विश्वस्तारिये बनाने का हरसंभव प्रयास किया । ह्वेनसांग नालंदा हर्ष के काल में ही आया था और वो अठारह साल तक नालंदा में रहकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया था । नालंदा अपने विकाश के चरण में समकालीन शासक पर निर्भर था , परन्तु उसकी स्वायता अक्षुण रखी गयी । इस तथ्य को हम इस रूप में देख सकते है कि गुप्तकाल या इसके उपरांत के शासक वर्ग मुख्य रूप से हिन्दू धर्म के अनुयायी थे इसके वावजूद नालंदा का विकाश बौद्ध धर्म के अध्ययन केंद्र के रूप में हुआ । इसके पीछे कहीं न कही नालंदा को विश्वस्तरिये अध्ययन केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास था । अध्ययन केंद्र के रूप में विकाश के पीछे तत्कालीन सामजिक परिस्थिति भी थी , समाज में बौद्ध एवं जैन धर्मावलम्बियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था ।

नालंदा मुख्य रूप से बौद्ध के महायान शाखा से सम्बंधित था । पाली भाषा की शिक्षा अनिवार्य थी । विश्वविद्यालय का परिसर १४ हेक्टेयर में फैला हुआ था । जिसमें ८ परिसर तथा १० मंदिर स्थित थे । समान्यत: सभी मंदिर बौद्ध धर्म के थे । यहाँ बौद्ध स्तूप होने का भी उल्लेख मिलता है । नालंदा विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण अंग इसका पुस्तकालय भी था । पुस्तकालय किसी भी संस्थान के आत्मा के रूप में जाना जाता है । पुस्तकालय के महत्व को हम उसकी नौ मंजली इमारत से अंदाज़ लगा सकते है । विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित मंदिरो में मंदिर संख्या तीन सबसे बड़ी थी ।

इतिहास की सबसे बड़ी विडम्बना है कि " किसी न किसी रूप में यह विनाश या अंत के पर्याय समझा जाता रहा है "। नालंदा का गौरवशाली इतिहास भी इस अछूता नहीं रहा पाया । विदेशी छात्रो के साथ - साथ यह विदेशी आक्रमणकारियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा था । नालंदा पर आक्रमण करने वाला प्रथम आक्रमणकारी हूण थे । मिहिराकुल ने सबसे पहले अपनी बुरी नज़र नालंदा पे डाला । इसके बाद के काल में नालंदा कई छोटे - बड़े आक्रमण का केंद्र रहा है , लेकिन सभी हमला बस लुट - पाट के लिए गए । जिसके वज़ह से इसके महत्व पर आंच नहीं आये । १२वी शताब्दी तक आते - आते समाज पूरी तरह से बदल चूका था । भारतीय शासक के हाथ से सत्ता जा चुकी थी और अरबो
का शासन स्थापित हो चूका था । अरबो का उद्देश्य भारत पर शासन करना ही नहीं था वरण वो इस्लाम को तलवार के बल पर स्थापित भी करना चाहते थे । इस के प्राप्ति के लिए अरबो ने सबसे पहले धार्मिक संस्थान और शिक्षण संस्थान की तरफ नज़र डाला । इसी करी में उन्होंने नालंदा पे आक्रमण किया । सन ११९३ई में ऐबक के एक सेनापति बख्तियार खिलजी ने इस महान शिक्षण संस्थान को अग्नी के चरणों में समर्पित कर दिया । विनाश का आकलन हम उस इतिहासिक तथ्य के आधार पर कर सकते है कि विश्वविद्यालय परिसर में लगी आग को समाप्त होने में छ; महीने से अधिक समय लग गए । इस सन्दर्भ
में इतिहासकारों का मंतव्य है कि " नालंदा के प्रभाव ने ही उसे प्रभावहीन कर दिया " ।

आज के पश्च्मिमोनुमुखी समाज में नालंदा के प्रति वैचारिक शून्यता आना स्वाभविक है । आर्थिक युग में हर चमकती चीज़ सोना होता है वही संस्कृति या परम्परा कचरे के ढेर से प्रतीत होते है । यही वजह है की नालंदा अपने अस्तित्व के साथ संघर्ष करता नज़र आता है । भारतीय शिक्षण संस्थान पूरी तरह से विदेशी संस्थान के नक़ल करने पर उतारू है जबकी नालंदा के गौरवशाली इतिहास को महत्व नहीं देते है । नालंदा के गौरव को वापस लाने में जनता तथा सरकार का नजरिया एक सा लगता है । आज़ादी के उपरांत सरकार नालंदा को एक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करने का प्रयास करने की कोशिश तो करती रही है परन्तु इसके गौरवशाली अतीत की उपेक्षा करती रही है । इस विषय पर चौतरफा मौन देखने को मिलता है । साहित्यकार तथा बुद्धिजीवी के बीच भी यह एक व्यंगात्मक उपमा से अधिक महत्व नहीं रखता है ।

नालंदा के गौरवशाली इतिहास को वापस लेन के प्रयास में तब एक
मह्त्वपूर्ण कदम उठाये गए जब तत्कलीन रक्षामंत्री जाँर्ज फर्नांडीस ने जापान के सरकारी यात्रा पर (१२ जनवरी २०००) नालंदा को पुनर्स्थापित करने की बात कही । इसके उपरांत संसद से नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के सम्बन्ध में विद्येयक बन जाने के बाद संभावना नज़र आता है । अंतररास्ट्रीय स्टार पर भी इसके पुनरउद्हार में सहयोग देने की बात कही गयी है । विश्व के कई देशों ने नालंदा को विश्वस्तारिये संस्थान बनाने के संबंद में प्रतिबधता दिखाते हुए सहयोगे की बात की है । लेकिन समस्त प्रयासों के बिच सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है कि " नालंदा अपने उस गौरवशाली परम्परा का निर्वाह कर पायेगा या अन्य भारतीय शिक्षण संस्थान की तरह इसका भी वही हश्र होगा " । यह यक्ष प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि " नालंदा वह अतीत है जो वर्तमान से अधिक आकर्षक और सुखद है "।
साभार -पंकज कुमार

1 comment:

  1. This is very interesting and informative to.Somthing must be done for NALNDA.

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